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दो प्रोत्साहन देने वाली लघुकथाएँ - Two encourageable short stories in hindi



हौसला बढ़ाने वाली दो कहानियां ,उम्मीद कभी न खोना - never lose hope।। Best short stories in hindi ।। Two encourageable short stories।। Running motivation story in Hindi




1. अनमोल एक दस साल का लड़का था। वह खेलो में बहुत अच्छा था। उसने अपने स्कूल में बहुत सी दौड़े जीती थी। एक बार उसका चयन एक धावक के रूप में अपने स्कूल का प्रतिनिधित्व करने के लिए अंतर विद्यालयी खेल प्रतयोगिता में हुआ। जबकि वह एक बहुत अच्छा धावक था फिर भी वह घबराने लगा क्योंकि प्रतियोगिता काफी कठिन होगी।
तभी, उसने एक छोटी सी चिटी को चीनी के एक दाने को ले जाते देखा। वह दीवार पर चढ़ने का प्रयास कर रही थी परन्तु वह बार-बार असफल हो रही थी। उसने प्रयत्न जारी रखा और अंत में वह अपनी मंजिल पर पहुंचने में सफल हुई। चिटी को देखकर, अनमोल ने सोचा कि यदि एक चिटी जैसे छोटे से प्राणी ने उम्मीद नहीं खोई और अपनी मंजिल तक पहुंच गई, तो वह क्यों हिम्मत हार जाए? उसे उम्मीद और हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। मुझे अपने लक्ष्य को पाने के लिए सबसे बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। अगले दिन से ही उसने अधिक से अधिक अभ्यास शुरू कर दिया। अन्तिम दौड़ में वह आत्मविश्वास पूर्वक दौड़ा और दस प्रतियोगिताओं में से दूसरे स्थान पर आया। अगले दिन सुबह की प्रार्थना सभा में, प्रधानाचार्य ने अनमोल की प्रशंसा की और सभी बच्चो ने उसके लिए तालिया बजाई। उसके माता-पिता और अध्यापक ने उस पर गर्व महसूस किया।



2.असम्भव कुछ भी नही  Napoleon Bonaparte inspirational story in Hindi


असम्भव कुछ भी नहीं है- यह वाक्य फ्रांस के महान सेनापति नेपोलियन बोनापार्ट का है जो गरीब घर में जन्मा था। परन्तु प्रबल पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प के कारण एक सैनिक कि नौकरी से फ्रांस का शहंशाह बन गया।
ऐसी ही संकल्प शक्ति के दूसरे उदाहरण है संत विनोबा भावे। बचपन में विनोबा जी गली में सब बच्चो के साथ खेल रहे थे। वहां बाते चली की अपने पूर्वजों में कौन-कौन संत हो गए। प्रतेक बालक ने अपने किसी न किसी पूर्वज का नाम संत के रूप में बताया। अंत में विनोबा जी की बारी आयी। विनोबा जी ने तब तक कुछ नहीं कहा परंतु मन ही मन दृढ़ संकल्प करके जाहिर किया कि अगर मेरे पूर्वजों में कोई अंत नही बना तो मै स्वयं संत बनकर दिखाऊंगा। अपने इस संकल्प के सिद्धि के लिए उन्होंने प्रखर पुरुषार्थ शुरू किया। और लग गए इसकी सिद्धि और अंत में एक महान संत के रूप में प्रसिद्ध हुए। यह है दृढ़ संकल्प और पुरुषार्थ का परिणाम है, इसलिए दुर्बल, नकारात्मक विचार छोड़कर उच्च संकल्प करके प्रबल पुरुषार्थ में लग जाओ, सामर्थ्य का खजाना तुम्हारे पास ही है। सफलता अवश्य तुम्हारे कदम चूमेगी।



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