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5+ small story in hindi with moral for kids - शॉर्ट नैतिक स्टोरी

 


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श्रुति की समझदारी प्रेरणा दायक कहानी  best short story in hindi

श्रुति एक पुलिस अधिकारी की बेटी थी। वह पढ़ने में काफी तेज थी तथा कक्षा में हमेशा प्रथम आती थी। उसके पिता सरकारी आवास न मिलने के कारण शहर के छोर पर किराए के मकान में रहते थे। वहीं पास में झुग्गी बस्ती थी जहां बहुत से गरीब परिवार रहते थे। वे सब मेहनत मजदूरी करके अपना जीवन यापन करते थे। इसी झुग्गी की एक महिला श्रुति के घर में काम करने आती थी। उसकी दस साल की एक लड़की थी जिसका नाम अंजू था। अंजू अक्सर अपनी मां के साथ श्रुति के घर पर आती थी।
अंजू श्रुति के घर उसके साथ खेलती थी, इस कारण श्रुति की सहेली बन गई थी। एक दिन श्रुति ने अंजू के स्कूल न जाने का कारण पूछा तो अंजू ने बताया की गरीबी के कारण वह तथा झुग्गी के अन्य बच्चे भी स्कूल नहीं जाते। उसने यह भी बताया कि उसकी झुग्गी बस्ती के बहुत बच्चे शहर के किसी पटाखा फैक्ट्री में काम करने जाते हैं। उसने श्रुति को यह भी बताया कि एक बार पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से उसकी बस्ती के कई बच्चे अपंग हो गए हैं। यह सब सुनकर श्रुति को बहुत दुख हुआ। उसे मालूम था कि सरकार ने बाल मजदूर पर प्रतिबंध लगा रखा है, तथा बच्चो को पढ़ाई के लिए मुफ्त व्यवस्था भी कर रखी है। शाम को पापा के घर आने पर श्रुति ने उन्हें अंजू द्वारा कही गई पूरी बात बताई तथा उसने प्राथना किया कि झुग्गी के बच्चो की पढ़ाई के लिए कुछ करे।
अगले दिन श्रुति के पापा ने पटाखा फैक्ट्री पर छापा मारकर बहुत से बाल मजदूर को मुक्त कराया तथा पटाखा फैक्ट्री के मालिक को बालश्रम कानून के उलंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन श्रुति के पापा ने झुग्गी के सभी बच्चो का नजदीक के सरकारी स्कूल में दाखिला दिवाया तथा उनके लिए कापी किताब की व्यवस्था कराई। श्रुति बहुत खुश थी कि उसकी प्यारी सहेली अंजू भी स्कूल जाने लगी थी।
सीख - श्रुति के समझदारी के कारण झुग्गी बस्ती के बच्चो को न केवल बल श्रम से मुक्त कराया बल्कि उन सभी बच्चो को स्कूल भी भेजवाया।



प्यासी मैना - short moral Stories in hindi  


एक मैना बगीचे में नीम के पेड़ पर रहती थी। बगीचे में एक पानी का नल था। मैना रोज बगीचे में दाना चुगती और नल के पास पानी पिती। एक दिन मैना को जोर से प्यास लगी और वह प्यास बुझाने के लिए नल के पास गई लेकिन उस दिन नल के पास उसे पानी नहीं मिला। निराश होकर मैना वहां से उड़ी और एक आम के पेड़ पर जा बैठी। वहां उसे एक तोता मिला। उसने तोते से पूछा कि पानी कहां मिलेगा, मुझे बहुत प्यास लगी है। तोते ने उसे बताया कि पास ही जामुन के पेड़ के नीचे एक घड़ा है, चलो वहीं चलकर पानी पीते हैं। लेकिन उस घड़े में पानी नहीं था। फिर दोनों वहा बैठे कबूतर से पूछा की पानी कहां मिलेगा। कबूतर उन दोनों के साथ पानी की तलाश में निकला लेकिन कही पानी नहीं मिला। फिर तीनो की मुलाकात कुछ गौरया से हुई। एक गौरैया उन तीनो को एक मकान के आंगन में ले गई। वहां एक बड़े मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर पौधे के छाव में रखा था। गौरैया ने उन्हें बताया कि एक छोटी सी लड़की रोज उस बर्तन में पानी भर देती हैं। फिर मैंने, तोता और कबूतर तीनो ने पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई।
सिख - आज के बदलते समय में जहां नदी तालाब होते थे वहां अब शहर बनते जा रहे हैं जिसकी वजह से जानवरो और पक्षी को जल तथा भोजन प्राप्त करने के लिए उन्हें बहुत से कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लेकिन वह नन्ही सी बच्ची उन पक्षियों के लिए प्रतिदिन पानी रखती हैं बिना किसी स्वार्थ के इसलिए हमें भी ऐसे ही प्रयास करने चाहिए।



बोलने वाली गुफा - short story in hindi for child

सुंदरवन में एक खूंखार शेर रहता था। उससे वन के सभी जानवर बहुत डरते थे। एक बार शेर को कई दिनों तक कोई शिकार नहीं मिला। वह शिकार कि खोज में जंगल में इधर-उधर भटक रहा था तभी उसे एक गुफा दिखाई दिया। गुफा का द्वार खुला था। शेर को लगा कि इस गुफा में जरूर कोई जानवर रहता होगा। लेकिन शेर ने देखा कि अंदर कोई जानवर नहीं था। शेर ने सोचा कि मुझे छिपकर रहना चाहिए क्योंकि गुफा में रहने वाला जानवर जरूर यहां आयेगा। वह गुफा एक लोमड़ी की थी। शाम होने पर लोमड़ी अब अपनी गुफा के पास आई तो उसे गुफा के बाहर किसी जानवर के पंजे के निशान दिखाई दिया। ध्यान से देखकर लोमड़ी समझ गई कि शेर गुफा में ही है। लोमड़ी ने पूरी तरह आश्वस्त होने के लिए की शेर गुफा में ही है, तब उसने एक तरकीब सोची। उसने गुफा कि तरफ मुंह करके आवाज लगाई कहिए गुफा जी! सब ठीक ठाक है ना? शेर को लगा की शायद गुफा लोमड़ी से बात करता होगा यही सोचकर शेर कुछ देर चुप चाप छिपकर बैठा रहा। लेकिन गुफा के कुछ न बोलने से शेर को लगा की शायद गुफा सो गया होगा, मुझे ही कुछ करना चाहिए। शेर अपनी आवाज बदल कर बोला, हा सब ठीक है, अंदर आ जाओ। लोमड़ी शेर की आवाज पहचान गई और वहा से भाग गई।
सीख - लोमड़ी अपनी चालाकी के कारण आने वाली समस्या से बच जाती हैं क्योकि वह उस मुश्किल समय में अपने बुद्धि विवेक का इस्तेमाल करती हैं, इस कारण से वह शेर का आहार बनने से बच जाती हैं। हमे भी मुश्किल समय में अपने बुद्धि विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए जिससे हम उस समस्या से बच सकते है।



ईष्या और क्रोध के बोझ का प्रभाव - moral story in hindi

एक बार एक गुरु ने अपने शिष्यों से कहाँ की वे घर जाकर आलू पर उन व्यक्तियों का नाम लिखे, जिनसे वे ईष्या करते है। आप जितने भी व्यक्तियों से ईष्या करते है, उतने ही आलू लेकर प्रत्येक पर उनका नाम लिख दे और उन आलुओं को थैली में रखकर उसे मेरे पास लेकर आए।

अगले दिन सभी लोग आलू की थैली लेकर आए। किसी के पास चार आलू थे, तो किसी के पास दो या आठ। प्रत्येक आलू पर उनका नाम लिखा था, जिनसे वे ईष्या करते थे। इसके बाद गुरूजी ने कहा कि अगले सात दिन तक वे सोते-जागते , खाते-पीते हमेशा जहाँ भी जाये , आलू की थैली को अपने साथ लेते जाए। सात दिन के बाद सभी गुरु जी के पास पहुँचे। उन्होंने सभी को अपनी थैलीया उनके पास रखने को कहाँ। इतना सुनते ही सभी ने चैन की सांस ली 2-3 दिन के बाद आलू सड़ने लगे तो सभी उसकी सडन और बदबू से परेसान होने लगे थे। गुरूजी के पूछते ही सभी आलू की दुर्गंघ से होने वाले कष्टो का व्योरा देने लगे। 

गुरूजी ने हँसते हुए कहा कि जब मात्र सात दिन में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिये की आप जिन व्यक्तियों से ईष्या करते है, उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा। आप लोगो को ईष्या की सड़न जरूर परेशान करती होगी। मगर उस बोझ को आप पूरी जिंदगी ढोते रहते है। इस अनावश्यक बोझ से आपके मन और दिमाग को कितना परेशान होती होगी। सीख - इसलिए हम सभी को किसी से भी ईष्या नहीं करना चाहिए।



साहूकार का बटुआ - moral story in hindi

एक बार गाव के एक साहूकार का बटुआ खो गया। उसने घोषणा की कि जो भी उसका बटुआ लौटाएगा, उस सौ रुपये का इनाम दिया जाएगा। बटुआ एक गरीब किसान के हाथ लगा था। उसमें एक हजार रूपये थे। किसान बहुत ईमानदार था, उसने साहूकार के पास जाकर बटुआ उसे लौटा दिया।
साहूकार ने बटुआ खोल कर पैसे गिने। उसमें पूरे एक हजार थे। अब किसानों को इनाम के सौ रुपये देने में साहूकार आगा-पीछा करने लगा। उसने किसान से कहा वाह तू तो बड़ा होशियार निकला इनाम की रकम तूने पहले ही निकाल ली। यह सुनकर किसान को बहुत गुस्सा आया। उसने साहूकार से पूछा सेठ जी आप कहना क्या चाहते हैं। साहूकार ने कहा मैं क्या कह रहा हूं तुम अच्छी तरह जानते हो। इस बटुए में कुल ग्यारह सौ रूपए थे। पर अब इसमें केवल एक हजार रुपये ही है। इसका अर्थ यह हुआ कि इनाम के सौ रुपये तूमने इसमें से पहले ही निकाल लिये हैं।
किसान ने कहा मैंने तुम्हारे बटुए में से एक पैसा भी नहीं छुआ है। चलो सरपंच के पास चलते हैं, वही फैसला हो जाएगा। फिर वे दोनों सरपंच के पास गए। सरपंच ने उन दोनों की बात सुनी। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि साहूकार बेईमानी कर रहा है। सरपंच ने साहूकार से कहा आपको पूरा यकीन है कि आपके बटुए में ग्यारह सौ रुपये थे।
साहूकार ने कहा ‘‘हां हां; मुझे पूरा यकीन है। सरपंच ने जवाब दिया, तो फिर यह बटुआ आपका नहीं है। और सरपंच ने बटुआ उस गरीब किसान को दे दिया।
सीख - झूठ बोलने की भारी सजा भुगतनी पड़ती है।


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